1857 की क्रांति, क्रांति के तात्कालिक कारण, राजस्थान में क्रांति

1857 की क्रांति, क्रांति के तात्कालिक कारण, राजस्थान में क्रांति

क्रांति के तात्कालिक कारण :-

◆ भारतीय सैनिकों को दी गई पुरानी ब्राउन बैस की जगह नई इनफील्ड राइफलें थी जिनमें कारतुस भरने से पहले उनके खोल को मुहँ से खोलना पड़ता था जिसमें गाय व सूअर की चर्बी लगी होती थी।
◆ दूसरा कारण भारतीय सैनिकों को दिये जाने वाले आटे में पशुओं की हड्डी का चूरा मिश्रित होना था।
◆ इस क्रांति के प्रतीक के रूप में कमल का फूल तथा चपाती थी।
◆ 29 मार्च, 1857 को बंगाल की बैरकपुर छावनी की 34 वीं रेजीमेंट के सैनिक मंगल पाण्डे ने विद्रोह किया तथा अपने सार्जेन्ट हयूसन की हत्या कर दी तथा 8 अप्रैल को मंगल पाण्डे को फासी दी गई।
◆ 10 मई, 1857 को इस क्रांति की शुरूआत मेरठ से हुई तथा मेवाड़ के सैनिकों ने दिल्ली पहँुच कर बहादुर शाह द्वितीय (जफर) को अपना राजा घोषित किया तथा बख्त सिंह को अपना सेनापति बनाया।
◆ बख्त सिंह को इस क्रांति का नायक कहा जाता है।
◆ इस समय भारत का गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग तथा कोलिन कैम्पवेल को भारत का सेनापति नियुक्त किया गया।

राजस्थान में क्रांति

◆ इस समय राजस्थान में 6 सैनिक छावनियाँ थी जिनमें नसीराबाद सबसे बड़ी थी।
1. नसीराबाद (अजमेर) 2. व्यावर (अजमेर) 3. एटिनपुरा (पाली)
4. खैरवाड़ा (उदयपुर) 5. देवली (टोंक) 6. नीमच
◆ इनमें से ब्यावर व खेरवाड़ा ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया।
◆ इस समय राजस्थान के ।ळळ जाॅर्ज वैद्रिक लोरेन्स थे।
◆ इसको इस विद्रोह की सूचना 19 मई को प्राप्त हुई।
◆ इस समय अजमेर में मेरठ से 15 वी बंगाल इन्फेन्ट्री आयी हुई थी।
◆ 1803 ई. में अंग्रेजों ने अजमेर स्थित अकबर इंफेन्ट्री की नाजुक स्थिति को देखते हुए पैट्रिक लोरेन्स ने इसे नसीराबाद भेज दिया।
◆ बम्बई लांसर्स से रात्रि गश्त लगवाना शुरू किया जो सबसे वफादार मानी जाती थी।
◆ 23 मई, 1857 को इसी 15 वीं बंगाल इनफैट्री ने नसीराबाद में विद्रोह की शुरूआत कर दी।
◆ 30 मई को नटीव इंफेन्ट्री भी इसमें शामिल हो गई।
◆ न्यूबरी, कै, पैनी व कै स्र्पोटिस वुड़ की हत्या कर दी।
◆ कै. प्रिचार्ड अन्य अंग्रेज अधिकारियों को लेकर ब्यावर स्थित रेजीमंेट में चला गया।

नीमच में विद्रोह

◆ नसीराबाद में विद्रोह की सूचना कर्नल एबाॅट को 2 जून को लगी तथा उसने सभी सैनिकों को एकत्रित किया तथा स्वामी भक्ति की शपथ ली।
◆ इसका अवध निवासी मौ. अली बेग ने विद्रोह किया।
◆ 3 जून को नीमच में विद्रोह हो गया।
◆ अंग्रेज अधिकारियों की हत्सा की गई जहाँ से ये अधिकारी डुंगला (उदयपुर) नामक गाँव पहुँचे जहाँ रूंगाराम राय नामक किसान ने इसको आश्रय दिया।
◆ तत्पश्चात् मेवाड़ के राजनीति अभिकर्ता शावर्स ने इन्हें सुरक्षित पिछोला झील में बने जगमंदिर में ठहराया।
◆ नीमच की विद्रोही सेना निम्बाहेड़ा होते हुए शाहपुरा पहँुची जहाँ मेजर शावर्स मेवाड़, कोटा व बुंदी की संयुक्त सेना लेकर युद्ध करने आया।
◆ परन्तु इसी समय इस संयुक्त सेना ने आटे के प्रश्न को लेकर विद्रोह कर दिया तब मेवाड़ के सेनापति अर्जुन लाल सहीवाल ने सेना के सामने इसी आटे की रोटिया खाकर विद्रोह शांत किया।

एरीनपुरा का विद्रोह

◆ पैट्रिक लोरेस ने जोधपुर महाराज तख्त सिंह को आबु की सुरक्षा हेतु सेना भेजने को कहा।
◆ इसी सेना ने आबु में विद्रोह कर अंग्रेज अधिकारियों को मार दिया तथा तख्त सिंह ने अपने दुर्ग के किलेदार ओनार सिंह पंवार को इस सेना को रोकने के लिए भेजा।
◆ विद्रोही सेना ‘चलो दिल्ली मारों फिरंगी‘ का नारा देते हुए एरिनपुरा पहँची तथा आऊवा (पाली) के ठाकुर कुशल सिंह का नेतृत्व स्वीकार किया।
◆ आरोप के ठा. शिवनाथ सिंह, गुलर के ठा. बिशन सिंह व अजीत सिंह ने भी अपनी सेनाएं कुशाल सिंह की मदद हेतु भेजी।
◆ तख्त सिंह ने अपने सेनापति कुशल राज सिंघवी को भेजा।
◆ हीथकोट भी इसी सेना के साथ आया था।
◆ 8 सितम्बर, 1857 को पिथौड़ा (पाली) के युद्ध में कुशाल सिंह विजयी रहा तथा ओनार सिंह इस युद्ध में मारा गया।
◆ तत्पश्चात् प्रथम बार पैट्रिक लारंेस स्वयं सेना लेकर अजमेर से बाहर आया तथा जोधपुर के राजनीतिक अभिकर्ता मेक मेशन भी लोरेस की सहायता के लिए जोधपुर से चला। (1857 की क्रांति)
◆ दिशाभ्रम होने से मेकमोस विद्रोही शिविर में पहुँच गया जहाँ उसकी हत्या कद दी गई तथा उसका शव आऊवा के दुर्ग के बाहर सलुम्बर के ठाकुर संगत सिंह द्वारा टांग दिया गया।
◆ 18 सितम्बर, 1857 को हुए चैलावास के युद्ध में कुशालसिंह की विजय हुई।
◆ इय युद्ध को गोटे व काले का युद्ध भी कहा जाता है।
◆ 20 जनवरी, 1858 को ब्रिगेडियर हाॅम्स ने आऊवा के दुर्ग को घेर लिया।
◆ कुशा ल सिंह ने दुर्ग अपने भाई पृथ्वीराज को सौपा तथा स्वयं सलुम्बर आ गया।
◆ हाॅम्स ने इस दुर्ग को जीता तथा लौटते समय इनकी कुलदेवी सुगाली माता की मूर्ति भी अपने साथ ले आये।
◆ 8 अगस्त, 1860 को कुशाल सिंह ने नीमच में आत्म समर्पण किया।
◆ इसके आरोपों की जांच के लिए टेलर कमीशन बना जिसने कुशाल सिंह को निदोष शाबित किया

कोटा में जनविद्रोह

◆ इस समय कोटा में राजनीतिक अभिकर्ता मि. बर्टन थे जो नीमच के विद्रोह को दबाने के लिए गये हुए थे।
◆ इस समय कोटा के शासक रामसिंह द्वितीय थे जिनके सरकारी वकील गोकुल निवासी जसदयाल थे तथा रिसालदार करौली निवासी मेहराब खां थे।
◆ बर्टन की अनुपस्थिति में इन दोनों ने विद्रोह करने की सोची।
◆ बर्टन के लौटने पर रामसिंह से इन दोनों को दण्डित करने के लिए कहा।
◆ नंद किशोर नामक व्यक्ति ने इस बात की सूचना इन दोनों को दी तथा 15 अक्टुबर, 1857 को कोटा में जनक्रांति शुरू हुई।
◆ मि. बर्टन का शर धड़ से अलग करके पूरे कोटा शहर मंे घुमाया गया साथ ही बर्तन के बेटे माइकल डाॅ. सैइलर व डाॅ. सेविष्ठ काॅटम का भी वघ कर दिया गया।
◆ इस क्रान्ति का उत्तरदायित्व रामसिंह पर थोपा गया तथा दोनों पक्षों के मध्य सन्धि करवाने में मथुरेश मन्दिर के महंत गोस्वामी महाराज की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
◆ रामसिंह को कोटा महल में नजरबंद कर दिया गया तथा 30 मार्च, 1858 को राबट्स की सेना ने कोटा पर पुनः अधिकार कर लिया।
◆ करौली के महाराव मदनपाल सिंह ने भी अपनी सेना राॅबट्र्स के साथ भेजी थी।
◆ जयदयाल व मेहराब खां को फाँसी से लटकाकर तोप से उड़ाया गया

तात्या टोपे

◆ ये नाना साहब के मुख्य सेनापति थे जिन्होने कानपुर में विद्रोह किया था।
◆ 8 अगस्त, 1857 को भीलवाड़ा के कुआड़ा नामक स्थान पर इनका जनरल राॅबट्र्स की सेना से युद्ध हुआ जिसमें ये हार गये।
◆ तात्या टोपे ने टोंक के नवाब वजीरूहोला के साथ भी युद्ध किया तथा नवाब को पराजित कर दिया।
◆ टोपे को 7 अप्रेल, 1859 को मानसिंह नरूका के विश्वास घात की वजह से नरवर के जंगलों में पकड़ लिया गया तथा 18 अप्रेल, 1859 को शिवपुरी (ग्वालियर) के दुर्ग में फाँसी दे दी गई।
◆ इसी दिन को (फाँसी का दिन) इस क्रांति का समापन माना जाता है।
◆ इस क्रांति में अंग्रेजों को सर्वाधिक सहायता मेवाड़ के शासक स्वरूप सिंह ने प्रदान की थी।
◆ जयपुर के रामसिंह द्वितीय ने अंग्रजों को सर्वाधिक वित्तीय सहायता मुहैया करवाया जिस वजह से उन्हें सितार-ए-हिन्द की उपाधि प्राप्त हुई।
◆ बीकानेर के शासक सरदार सिंह एकमात्र ऐसे शासक थे जो विद्रोहियों के विरूद्ध युद्ध करने बडाडू नामक स्थान तक गये थे।
◆ धोलपुर में इस क्रांति का नेतृत्व रामचन्द्र व हीरालाल ने किया। (1857 की क्रांति)
◆ अमर चंद बांठिया इस क्रांति के फलस्वरूप फाँसी पाने वाले प्रथम क्रांतिकारी थे।

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