भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार

मूल अधिकार

इस पोस्ट में भारत के नागरिकों को संविधान में प्राप्त मूल अधिकारों (मौलिक अधिकार) से संबंधित जानकारी उपलब्ध करवाई गई है भारतीय संविधान में नागरिकों को समानता का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरूद्व अधिकार, संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार आदि अधिकार प्राप्त है इन अधिकारों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी गई है

  • मूल अधिकारों का जन्म 1215 में इंग्लैण्ड में हुआ।
  • 1215 के महान अधिकार पत्र को मौलिक अधिकारों का ‘‘मेग्नाकार्टा’ कहा जाता है।
  • 1789 की फ्रांस की क्रान्ति के बाद लागू नये संविधान में नागरिकों को पहली बार संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर मौलिक अधिकार प्रदान किये गये।
  • 1791 में अमेरिकी संविधान में दिये गये प्रथम 10 संषोधनों के माध्यम से नागरिकों को व्यवस्थित रूप से मूल अधिकार प्रदान किये गये
  • अमरीकी संविधान में किये गये इन्हीं प्रथम 10 संषोधनों को ‘‘बिल ऑफ राइट’’ कहा जाता है।
  • 1946 में न्ण्छव की सामाजिक एवं आर्थिक परिषाद् ने एलोनोर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में मानवाधिकार आयोग का गठन किया।
  • 10 दिसम्बर, 1948 को न्ण्छव ने मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा की। इसी कारण प्रतिवर्ष 10 दिसम्बर को ‘‘मानवाधिकारों दिवस’’ मनाया जाता है।
  • भारतीय संविधान में मूल अधिकारों अमरीकी संविधान से ग्रहण किये गये है।
  • भारतीय संविधान के भाग-3 में अनु0 12 से 35 तक नागरिकों को 7 मूल अधिकार प्रदान किये गये थे।
  • 44 वें संविधान संषोधन 1978 के तहत अनु0 31 में वर्णित सम्पत्ति के मूल अधिकार को मौलिक अधिकारों की श्रैणी से हटाकर अनु0 300 (क) के तहत एक कानूनी अधिकार बना दिया गया।
  • वर्तमान में नागरिकों को 6 मूल अधिकार प्राप्त है।
  • मूल अधिकारों की प्रवृत्ति ‘‘नकारात्मक’’ होती है।
  • मूल अधिकार वादयोग्य है न्यायालय मे प्रवर्तनीय होते है।
  • मूल अधिकार व्यक्ति को व्यक्ति के तथा राज्य के विरूद्व प्राप्त हैं।

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  1. समानता का अधिकार (अनु0 14-18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनु0 169-22)
  3. षोषण के विरूद्व अधिकार (अनु0 23, 24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु0 25-28)
  5. संस्कृति एवं षिक्षा सम्बन्धी अघिकार (अनु0 29, 30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनु0 32)

समानता का अधिकार – (अनु0 14 से 18 तक)

अनु0 14:- कानून के समक्ष समानता – (यह व्यवस्था ब्रिटेन से ली गई है।

अनु0 15:- सामाजिक समानता:- जाति, धर्म, रंग, जन्म, स्थान व लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध।

अनु0 16:- लोक-नियोजन के क्षेत्र में अवसर की समानता या सरकारी नौकरियों में समान अवसर।

अनु0 17:- अस्पृष्यता का अंत:-

  • पहली बार अस्पृष्यता अधिनियम 1955 में बनाया गया।
  • 1976 में इसे संषोधित करके इसका नाम ‘‘नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम’’ कर दिया गया।
  • 1989 में इसे ओर अधिक अधिक कठोर करते हुए इसका नाम ‘‘अनुसूचित जाति एवं जनजाति निरोध कानून 1989’’ कर दिया गया।

अनु0 18 उपाधियों का अन्त:- राज्य षिक्षा व सैन्य क्षेत्र को छोड़क्र अन्य किसी भी क्षेत्र में उपाधियों नहीं प्रदान कर सकता।

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स्वतंत्रता का अधिकार (अनु0 19 से 22)

मूल संविधान में अनु0 19 के अन्तर्गत नागरिकों की सात स्वतंत्रतायें प्रदान की गई थी परन्तु 44 वें संविधान संषोधन 1978 के तहत अनु0 19(1) (च) में वर्णित सम्पत्ति के अर्जन, धारण एवं व्यय करने के स्वतंत्रता को हटा दिया गया। इस कारण वर्तमान में नागरिकों को अनु0 19 के तहत नागरिकों को 6 स्वतंत्रतायें प्राप्त है।

अनु0 19(1)(क):- विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

अनु0 19(1)(ख):- शांतिपूर्ण और निरायुद्व सम्मेलन की स्वतंत्रता।

अनु0 19(1)(ग):- संघ व समुदाय बनाने की स्वतंत्रता।

अनु0 19(1)(घ):- भारत के राज्य-क्षेत्र के किसी भी भाग में आबाद भ्रमण की स्वतंत्रता।

अनु0 19(1)(छ):- वृत्ति, उपजीविका, व्यापार एवं कारोबार करने की स्वतंत्रता।

अनु0 20:- अपराधों के लिये दोष-सिद्व के सम्बन्ध में संरक्षण।

  • किसी भी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसने अपराध के समय लागू किसी विधि का उल्लंघन नहीं किया हो।
  • एक अपराध के लिये केवल एक बार ही सजा दी जा सकती है।
  • व्यक्ति को अपने विरूद्व साक्ष्य देने के लिये बाध्य नहीं दिया जा सकता।

अनु0 21:- प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता

  • किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा अन्य किसी भी तरीके से प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। (मौलिक अधिकार)
  • विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया भारतीय न्यायिक पुनरावलोकन का आधार है जबकि कानून की उचित प्रक्रिया अमरीकी न्यायिक पुनरावलोकन का आधार है।

अनु0 21():- इसे 26 वें संविधान संषोधन 2002 के तहत जोड़ा गया। तथा व्यवस्था की गई कि राज्य 6-14 वर्ष तक के बच्चों के लिये अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करेगा।

  • मूल संविधान के अनु0 45 में कहा गया है कि संविधान लागू होने के 10 वर्ष के भीतर-भीतर राज्य 6-14 वर्ष के बच्चों के लिये अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करेगा।
  • 1 अप्रैल, 2010 से अनिवार्य षिक्षा विधेयक लागू कर दिया गया।

अनु0 22:- कुछ दशाओं में गिरफ्तारी एवं निषेध से संरक्षण।

  • बन्दी बनाये गये व्यक्ति को 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित करना होगा। उसकी अनुमति के बाद ही उसे न्यायिक अभिरक्षा में रखा जा सकता है।
  • बन्दी बनाये गये व्यक्ति की बन्दी बनाये जाने के कारण यथाषीघ्र बताने होंगे।
  • बन्दी बनाये व्यक्ति को वकील से परामर्ष करने का अधिकार होगा।

नोट:- निवारक निरोधक कानून (अपराध को रोकने के लिये) के तहत गिरफ्तार किये गये वयक्तियों तथा विदेषी षत्रुओं पर यह अनुच्छेद लागू नहीं होता।

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शोषण के विरूद्व अधिकार (अनु0 23, 24)

अनु0 23ः- मनुष्य के क्रय-विक्रय एवं बेगार पर प्रतिबन्ध।

अनु0 24:- बाल-श्रमक का निषेध (14 वर्ष)

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु0 25 से 28):-

अनु0 25:- अन्तः करण की स्वंतत्रता।

सिक्खों द्वारा कृपाण धारण करके चलने का अधिकार उन्हें अनु0 25 के तहत प्राप्त हैं।

अनु0 26:- धार्मिक मामलों में प्रबन्धन की स्वतंत्रता।

अनु0 27:- धार्मिक व्यय के लिये निष्चित-धन पर कर अदायगी में छूट।

अनु0 28:- राजकीय एवं अद्र्वराजकीय षिक्षण-संख्याओं में धार्मिक षिक्षा का निषेध।

संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनु0 29 व 30)

अनु0 29:- अल्पसंख्यक वर्गो के हितों का संरक्षण

अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, संस्कृति एवं किसी को जीवित रख सकते है।

अनु0 30:- अल्पसंख्यक वर्गो को शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना करने का अधिकार।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अुन0 32)

यदि व्यक्ति के मूल अघिकारों का हनन हो रहा हो तो अनु0 32 के तहत वह न्यायालय की षरण ले सकता है। न्यायालय व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा करने हेतु पांच प्रकार की रिट जारी करता है।

  1. बन्दी-प्रत्यक्षीकरण:- बन्द बनाये गये व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से न्यायालय में उपस्थित करना।
  1. परमादेष:- यदि कोई अधिकारी या संस्था कार्य नहीं कर रहे है तो न्यायालय आदेष जारी करता है कि उक्त कार्य आपके अधिकार-क्षेत्र में है। अतः आप इसे कीजिये।
  1. उत्प्रेषण:- अधीनस्थ न्यायालयों में लम्बित मुकदमों को शीघ्र न्यायिक निर्णय हेतु ऊपर के न्यायालयों में भेजने के लिये यह जारी की जाती है।
  1. प्रतिषेध:- यदि कोई व्यक्ति या संस्था अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य करती है तो न्यायालय द्वारा यह रिट जारी की जाती है। और कहा जाता है कि उक्त कार्य आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं हे अतः आप इसे नहीं कर सकते।
  1. अधिकार-पृच्हठा:-  किसी अधिकारी से उसकी नियुक्त का आधार पूछा जाता है।
  • मूल अधिकारों को निलम्बित करने की वयक्ति आपातकाल के दौरान अनु0 358 के तहत केवल राष्ट्रपति को प्राप्त है।
  • 44वें संविधान संषोधन, 1978 की व्यवस्था के तहत आपातकाल मे भी अनु0 20 और 21 निलम्बित नहीं होते।
  • क्या भारतीय संसद मुल अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है। ऐसा प्रष्न पहली बार 1951 में शंकर प्रसाद बनाम भारत संववाद में उठाया गया। इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय लिया। कि संसद मूल अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है।
  • 1965 के सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्यवाद में भी न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय की पुष्टि की।
  • 1967 के गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्यवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय लिया कि संसद मूल अधिकारों में परिवर्तन नहीं कर सकती। (मौलिक अधिकार)

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