महिला सशक्तिकरण क्या है, महिला सशक्तिकरण का अर्थ एवं परिभाषा

महिला सशक्तिकरण का अर्थ एवं परिभाषा

भारत की बहु आयामी संस्कृति हमारे देश की प्रमुख विशेषता है। विभिन्न भौगोलिक प्रदेश, विभिन्न धर्म, विभिन्न भाषाऐं, विभिन्न जातियां, विभिन्न रीति-रिवाज व विभिन्न उप-संस्कृतियां इसके सुदृढ उपांग हैं। (महिला सशक्तिकरण क्या है, mahila sashaktikaran kya hai, महिला सशक्तिकरण का अर्थ, महिला सशक्तिकरण परिभाषा, mahila sashaktikaran kya hai hindi mai,)
आजादी की लम्बी लड़ाई के बाद हम स्वतन्त्र हुए और हमने अपने संविधान में व्यवस्था की, कि उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक , आर्थिक व राजनैतिक न्याय मिले। हमनें संविधान की उद्देशिका में व्यक्ति की गरिमा को केन्द्र बिन्दु बनाया।
हमारे देश की लगभग आधी आबादी महिलाओं व बालिकाओं की है। हमने संविधान में व्यवस्था की, कि राज्य किसी नागरिक के विरूद्ध धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा। मानव मात्र के दुव्र्यापार और शोषण को पूर्णरूप से प्रतिषिद्ध किया। हमने यह भी व्यवस्था की, कि पुरूष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से आजीविका प्राप्त करने का साधन प्राप्त हो, पुरूषों एवं महिलाओं दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले, महिलाओं की प्रसूति के लिए अवकाश व अन्य सहायता का उपबन्ध भी संविधान में किया गया है। सभी नागरिकों को समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास किया जायेगा। संविधान में यह भी व्यवस्था की, कि बालक बालिकाओं को चैदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का उपबन्ध करने का प्रयास किया जायेगा।10

प्राचीन काल, विशेषकर वैदिक युग हिन्दू समाज व नारी जाति के लिए एक स्वर्णिम युग था। इस युग में नारी की स्थिति अत्यन्त उन्नत थी और उन्हें अपने विकास के समस्त अधिकार प्राप्त थे। वैदिक साहित्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उस समय नारी की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक स्थिति अति उच्च थी। उनका आत्म विकास शिक्षाा, विवाह सम्पति सम्बंधी अधिकार लगभग पुरूषों के अधिकारों के समान ही हुआ करते थे।

प्रत्येक क्षेत्र में नारी को बहुत सम्मान व ऊंचा दर्जा प्रदान किया जाता था। युवतियों को शिक्षा प्राप्त करने व मेल-मिलाप करने की पूर्ण स्वतन्त्रता थी और उनके विकासात्मक अधिकारों पर कोई प्रतिबंध नहीं था। समस्त धर्मग्रंथों में नारी महिमा का सम्मानपूर्वक महिमामण्डन किया जाता था। आज के समान ही उसे पुरूष की अद्र्धांगिनी माना जाता था और उसके बिना पुरूष कोई भी धार्मिक कार्य नहीं कर सकते थे। ऋग्वेद व महाभारत जैसे ग्रन्थों में पत्नी विहीन घर को घर नहीं कहा गया है।

धर्मग्रंथों में ‘यत्र नार्यस्तु पूजयंते, रमंते तत्र देवता’ सूक्ति के माध्यम से स्त्री के सम्मान को दर्शाया गया है। स्पष्ट तौर पर प्राचीनकाल नारी के विकास, सशक्तिकरण और सम्मान का काल था, जब उसे समाज में विकास के समस्त साधन प्राप्त थे और वह पुरूष के समकक्ष बराबर का अधिकार पाती थी।

नारी धीरे-धीरे समय और विचारधाराओं के परिवर्तन से ज्ञात और अज्ञात कारणों से घर की ऊँची-ऊँची चार दीवारी में बन्द होकर अविधान एवं अज्ञान के अधंकार में डुबकियां लगाने लगी उसका पग-पग पर अपमान होता रहा तथा लगातार ठुकराए जाने के बावजूद भी वह जीवन की अन्तिम श्वांस तक सामाजिक यातनाओं को चुपचाप सहन करती रही। बाल विवाह, पर्दा-प्रथा, विधवाओं की दीन-हीन दशा, सती प्रथा, कन्या पक्ष का नीचा समझा जाना, नारी की उच्च शिक्षा का बहिष्कार उत्तराधिकार से वंचित होना और आर्थिक परतन्त्रता जैसी सामाजिक कुरीतियों से पराधीन भारत को इतना निम्न बनाया जाता रहा कि वह नारी की पीड़ा को समझ न सका और आज स्वतन्त्रता के कई वर्षों बाद भी बार-बार सचेत किए जाने पर भी भारत में पूर्णरूपेण महिला जाग्रति नहीं हो पाई है। 21वीं सदी मेें कदम रखने वाले भारतीय समाज में नारी को आज भी वह दर्जा प्राप्त नहीं हुआ जो कि उसे बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। नारी ने पूरी शिद्धत के साथ विपरीत और विषमतर परिस्थितियों में भी अपनी पहचान और महत्ता को सिद्ध किया है। नारी शक्ति, शौर्य और सामथ्र्य का दूसरा नाम है।

महिला सशक्तिकरण के सन्दर्भ में यह जानना अति आवश्यक है कि महिला सशक्तिकरण के वास्तविक सूचक या संकेतक क्या होने चाहिए जिससे यह पता चल सके कि उस दिशा में किया गया कार्य किस सीमा तक प्रभावी हुआ है। सशक्तिकरण के सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे को सशक्त नहीं करता। विकास के सन्दर्भ में इस शब्द के प्रयोग का अर्थ गरीब एवं अभिवंचित वर्ग द्वारा स्वतः प्रयासों द्वारा अपने को सशक्त करना है। अतः यह स्पष्ट होना चाहिए कि सशक्तिकरण कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो जनसाधारण को उठाकर दे दी जाए। सशक्तिकरण की प्रक्रिया व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी। व्यक्ति के समूह से जुड़ाव के कारण उसकी जानकारी एवं ज्ञान में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है तथा अपने को संगठित कर अपने जीवन स्तर में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने की क्षमता भी जागृत होती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सशक्तिकरण की प्रक्रिया सहभागिता पर आधारित है। यह गरीबों में उनके जीवन को प्रभावित करने वाले विषयों पर स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति का संचार करती है।

पिछले अनुभवों से यह स्पष्ट है कि महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार तथा सशक्तिकरण का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। यह ज्ञातव्य है कि उनकी शक्तिहीनता का मुख्य कारण सामाजिक, सांस्कृतिक एवं संरचनात्मक है न कि उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति। अतः केवल आर्थिक विकास एवं सशक्तिकरण को साथ जोड़कर देखना निरर्थक है। आर्थिक वृद्धि को विकास का मानक पुरूष नीति निर्धारकों द्वारा अपनाया गया है। उद्धमिता सम्बन्धित आत्मनिर्भरता के माध्यम से सशक्तिकरण हेतु प्रयास घरेलू स्तर पर तो सम्भव है परन्तु यह राजनैतिक, सामाजिक शक्तियां तथा ऐतिहासिक वर्गवाद को प्रभावित करने में सहायक नहीं होती। सशक्तिकरण की विभिन्न परिभाषाओं के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सशक्तिकरण एक प्रक्रिया है जिनके मुख्य अवयव शक्ति संरचना पर नियन्त्रण करना, सहभागिता तथा विकास की दशा को प्रभावित करना है। अपने बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण, आत्मविश्वास विश्लेषणात्मक योग्यता जागरूकता में बढोतरी, गतिशीलता में बढोतरी तथा समुदाय के बीच अपनी स्पष्ट पहचान बनाना भी सशक्तिकरण प्रक्रिया के अभिन्न अंग हैं। इस आधार पर सशक्तिकरण को एक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो महिलाओं में गतिशीलता, आत्मविश्वास, अनुकूल स्वदृष्टिकोण तथा जागरूकता का संचार करती है जिससे निर्णयात्मक क्रिया में उनकी प्रभावी भागीदारी सम्भव हो सके तथा विश्लेषणात्मक योग्यता द्वारा विकास की दिशा को न केवल नियन्त्रित कर सके बल्कि उसकी दिशा को अपने हित में मोड़ने की क्षमता रख सके।

भारत में नारी जागरण का प्रारम्भ उन्नीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध मे हुआ। नारी को समाज मे उचित स्थान दिलाने के लिए एक ओर तो राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी जैसे महान समाज सुधारकों ने भरसक प्रयत्न किया, दूसरी ओर पश्चिम की नारी से प्रभावित होकर भारतीय नारी ने अपने स्वरूप को पहचानना प्रारम्भ कर दिया। पुरूष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर देश के विकास में बराबर भाग लेती हुई पश्चिम की नारी को देखकर भारतीय नारी ने भी रूढिवादी जीवन को तिलांजलि देकर नवयुग का आहृान किया।14
एक साधारण सा स्वाल है कि किसी महिला के लिए विकास अधिक महत्तवपूर्ण है या सशक्तिकरण ज्यादा जरूरी है जवाब है, दोनों ही जरूरी हैं और दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। सशक्तिकरण के बिना महिला विकास की बात सोचना फिजूल है। महिला सशक्तिकरण अर्थात महिलाओं को प्रतिभाशाली बनाना, महिलाओं को वे सारे उपकरण उपलब्ध करवाना जिनकी सहायता से ‘आधी दुनिया’ उन्नति कर सकती है, आगे बढ सकती है। भारत ही नहीं समूची दुनिया में आज महिला सशक्तिकरण का दौर है, इस विषय पर सेमीनार हो रहें हैं, कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं और सरकारों द्वारा विभिन्न कानून बनाए जा रहे हैं।

महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य केवल स्त्रियों के सामाजिक उत्थान से नहीं है, बल्कि इसमें समूची नारी जाति को शामिल किया जाता है, जिसे किन्ही कारणों से अपने विकास का अवसर नहीं मिला-भले ही वे भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण पुरूषों की अपेक्षा पिछड़ी रहीं हों अथवा उनके विकास के अवसरों में पक्षपात किया गया हो। ऐसी उपेक्षित लड़कियों व महिलाओं की प्रगति से ही सामाजिक उन्नति संभव है। ऐसी प्रगति की पृष्ठभूमि उनके शैक्षिक क्षेत्र को सुदृढ करके तैयार की जा सकती है, जिसमें समाज, परिवार व सम्बन्धित इकाइयों की सशक्त भूमिका रहे। प्रगति के ये अवसर ही उनके विकास को दिशा प्रदान कर सकते हैं।

किसी साक्षर व शहरी महिला के लिए सशक्तिकरण का अभिप्राय अपने अधिकारों की प्राप्ति तथा अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष हो सकता है, किन्तु एक निरक्षर महिला के लिए यह ‘मन की हरियाली’ हो सकता है। ऐसा कार्य व अधिकार जिसे करने के लिए वह स्वतन्त्र हो और जिसके माध्यम से वह अपने अस्तित्व व शक्ति को पहचान कर आत्मसन्तुष्टि अनुभव कर सके।

अतः सशक्तिकरण की कोई निश्चित परिधि नहीं, कोई सटीक परिभाषा नहीं। यह महिलाओं के सतत विकास हेतु चलने वाले प्रयासों की प्रक्रिया का माध्यम है, जो कभी अधिकार, कभी शक्ति, कभी सशक्तिकरण के रूप में मौजूद रहता है।

नारी सशक्तिकरण के परिप्रेक्ष्य में विश्वभर में नारी विकास का विषय महत्वपूर्ण बन चुका है। विकास की दृष्टि से मानव विकास दृष्टिकोण में परिवर्तन के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण की धारणाा भी बलवती हो चुकी है, इसलिए आज महिलाओं की स्थिति के निर्धारण में महिला सशक्तिकरण को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है।

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उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में सारी दुनिया में सुधारवादी आन्दोलनों का जोर था तो भारतीय समाज भी भला इससे कैसे बचा रह सकता था। उस दौर में सुधारवादी आन्दोलनों ने भारतीय समाज की संरचना को गहराई तक प्रभावित किया। इस सामाजिक चेतना की बदोलत दलित, पिछड़े और महिलाएं बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आन्दोलनों में सम्मिलित हुई। यह वही दौर था जब अनेकों महिलाओं ने भारत की आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि महिलाएं जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे आने लगी। इसी दौर में पुरातन परम्पराओं का विरोध भी शुरू हो गया। अब ऐसी परम्पराओं पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे थे जो स्त्रियों को पुरूषों के मुकाबले कम करके आंकती थी।

जब महिलाएं हर क्षेत्र में काम करने लगी और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उन्होंने अपनी सफलता के झण्डे गाड़ने शुरू कर दिए तो दुनिया भर में महिला सशक्तिकरण की बातें की जाने लगी। उस समय समाज में अनेक ऐसी परम्पराएं मौजूद थी जो महिलाओं को दूसरे दर्जे का प्राणी मानती थी इसलिए ऐसे कानून बनाए गए जिनकी सहायता से महिलाओं को संरक्षण दिया जा सके, उन्हें आगे बढने क मौके दिए जा सकें। इसके अलावा उस समय अस्तित्व में रहे कानूनों में भी व्यापक संशोधन किए गए ताकि महिलाओं की सामाजिक आर्थिक तथा पारिवारिक स्थिति में सुधार हो सके। जैसे- हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1950 इसमें माता-पिता की सम्पति में पुत्रियों को पुत्रों के समान ही सम्पति का अधिकार दिया गया था। उस समय यह अधिनियम लागू नहीं हो सका था लेकिन सन् 2005 में केन्द्र सरकार ने यह महत्वपूर्ण कानून सारे भारत में लागू कर दिया है।

अपरिपक्व नारी समाज में अपना ज्यादा योगदान नहीं दे सकती है इसलिए 1978 में बाल-विवाह अधिनियम (संशोधन) के द्वारा लड़कियों की विवाह योग्य आयु 15 वर्ष से बढाकर 18 वर्ष कर दी और बाल-विवाह को अपराध घोषित कर दिया गया। इसके बाद भारतीय संसद ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, भारतीय दण्ड संहिता और अपराध प्रक्रिया संहिता आदि मे व्यापक संशोधन किए ताकि महिला उत्पीड़न के मामले रोके जा सकें। महिलाओं की खरीद-फरोखत तथा वेश्यावृति को गैर-कानूनी घोषित किया गया। दहेज विरोधक कानून के द्वारा दहेज लेने व देने को अपराध मानते हुए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।

यह सत्य है कि आर्थिक विकास के बिना बाकी सभी विकास बेमानी है इसलिए महिलाओं के आर्थिक विकास हेतु कई कार्यक्रम चलाए गए। समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम स्वरोजगार हेतु ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण, ग्रामीण क्षेत्र में महिला एवं बाल-विकास कार्यक्रम, गंगा कल्याण योजना आदि में महिलाओं को प्रमुखता दी गई। इसके बाद वन् 1998 में केन्द्र सरकार द्वारा ‘ स्वशक्ति ’ नामक योजना चलाई गई । इन कार्यक्रमों का उद्धेश्य था महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण।

शिक्षाा भी सशक्तिकरण के लिए बेहद आवश्यक है इसलिए बालिका शिक्षा के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए गए। सरकार द्वारा महिला शिक्षा को बढावा देने प्रयास किये जा रहें हैं। आज हमारे यहां लड़कियों के लिए बारहवीं कक्षा तक की शिक्षा मुफ्त है। इसके अलावा गरीब तथा दलित वर्ग की बालिकाओं को वजीफा दिए जाने की व्यवस्था है ताकि उनकी शिक्षा में किसी प्रकार की कोई बाधा पैदा न हो।17
महिला शैक्षिक सशक्तिकरण ने महिला विकास की गति को तेज किया और उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में कदम रखे। सेना, अंतरिक्ष, न्याय, विज्ञान, चिकित्सा आदि। समस्त क्षेत्रों में उन्होंने उल्लेखनीय प्रगति की और विकास कार्यो में पुरूष के कन्धे से कंधा मिलाकर देश की प्रगति में अपना योगदान दिया। आज नारी अपने अधिकारों के प्रति पूरी तरह जागरूक हो चुकी है और महिला सशक्तिकरण के अर्थ को समझते हुए नारी जाति के उत्थान में अपना अतुलनीय योगदान दे रही हैं।

महिलाओं के राजनैतिक सशक्तिकरण की दिशा में 73 वां तथा 74 वां संविधान संशोधन, 1992 एक महत्वपूर्ण कदम है राजनीतिक सशक्तिकरण का अर्थ औपचारिक राजनैतिक संस्थाओं में महिलाआंे की भागीदारी है। वर्तमान में ंदेश के राजनैतिक ढांचे में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। इस बात को छोड़कर कि इस देश में महिलाएं प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री के पदों पर रही हैं तथा अन्य कुछ वरिष्ठ पदों पर भी महिलाएं पहुँच सकी हैं। सामान्यतः महिलाओं की पहुँच सत्ता तथा राजनैतिक निर्णय लेने वाले तन्त्रों से अब भी दूर हैं। राजनैतिक पार्टियां महिलाओं को राजनैतिक क्षेत्र में बराबरी का दर्जा देने के लिए बहुत सारे वादे तो करती हैं परन्तु अभी भी राजनैतिक पार्टियों में तथा उन पार्टियों के माध्यम से चुने गए संसद विधान मण्डल आदि संस्थाओं के प्रतिनिधियों में पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है। 73 वंे संविधान संशोधन के बाद त्रिस्तरीय पंचायती राज का उदय हुआ है जिसमें महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत पद आरक्षित किये गये हैं। उक्त संशोधन के बाद, पंचायत चुनाव में लगभग 10 लाख से अधिक सदस्य एवं पंचायत पदाधिकारी के रूप में महिलाएं चुनी गई हैं। इस प्रकार पंचायती राज में चयनित महिलाओं का एक बड़ा समूह निर्णय लेने की प्रक्रिया में नए तरीके से जुड़ गया है तथा यह अपेक्षा की जाती है कि इन संस्थाओं द्वारा नियोजन तथा अन्य कार्यों में महिलाओं के पक्ष की अनदेखी नहीं हो पायेगी। आवश्यकता इस बात की है कि इन महिलाओं की सफल सहभागिता हेतु उनकी क्षमता में समुचित विकास किया जाय।

महिलाएं अगर स्वावलंबी हो तो उन पर जुल्म नहीं होंगे यदि होंगे तो कम होंगे। स्वावलंबी होने से औरत का स्वाभिमान भी बढता है और उसका आत्मसम्मान भी, साथ ही वह प्रतिकूल निषेधों और प्रतिबन्धों को नकारने की क्षमता हासिल कर लेती है। वह समाज की संकीर्ण परम्पराओं से मुक्ति की राह पर चल सकती है। दरअसल औरत को कमजोर बनाने में उसके परजीवी होने के साथ-साथ समाज की आचार संहिताएं भी जिम्मेदार हैं।

स्वावलम्बन उसे इन बेड़ियों से मुक्त करने का एक मजबूत आधार देता है। समाज में महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है। इससे छुटकारा पाने के लिए महिलाओं में चेतना की दरकार है तांकि उनकी अपनी मानसिकता भी बदले। यह स्वावलंबी होने पर आसानी से बदली जा सकती है। ऐसी चेतना शिक्षा और संघर्ष से ही आ सकती हैं जिसका अभी अभाव है। इसलिए महिला सशक्तिकरण की तरफ अगर कोई ठोस कदम उठाया जाता है तो वह होगा शिक्षित तथा अशिक्षित महिलाओं के लिए योग्यतानुसार रोजगार प्रदान करना, रोजगार के योग्य बनाने के लिए उनके प्रशिक्षण व शिक्षण की व्यवस्था करना ताकि वे हर क्षेत्र में काम कर सकें। औरत अभी तो केवल अपने कर्तव्यों को ही जानती है इसलिए उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी होना भी नितान्त आवश्यक है तभी उनकी हीन भावना समाप्त हो पाएगी। अनपढ महिलाओं को साक्षर और जागृत करने के लिए विशेष आयोजन भी करने जरूरी हैं।

स्वावलंबन महिला में स्वाभिमान पैदा करता है और स्वाभीमान उन्हें चेतना से सम्पन्न करता है और चेतना उनकी सामथ्र्य का निर्माण करती है। इसलिए सशक्तिकरण के लिए स्वावलंबन जरूरी है।

भारतीय महिलाओं को अधिकार दिए जाने की जरूरत है जब इन्हें वाजिब राजनैतिक व सामाजिक अधिकार मिल जाएंगें तो वे स्वतः ही विकास के रास्ते पर चल पड़ेगी। ‘आधी दुनिया’ को विकास से महरूम रख कर ‘विकास’ का सपना देखना महज एक बेवकूफी ही है।
स्पष्ट है कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे बड़ा रोड़ा महिलाओं में शिक्षा और जागरूकता की कमी ही है। यदि महिलाओं को शिक्षित बना दिया जाए तो वे अपने सामाजिक व राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाएंगी और फिर ऐसी जागरूक महिलाओं को दबाना किसी के लिए सम्भव नहीं रह पाएगा इस दिशा में गैर-सरकारी संगठन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। ‘स्वप्निल’ भारत जैसे कुछ महिला-विकास से संबंधित गैर-सरकारी संगठन काफी अच्छा कार्य कर रहे हैं। महिला सशक्तिकरण हेतु गैर-सरकारी संगठनों को प्रोत्साहन देना वक्त की जरूरत है, समय की मांग है।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि किसी भी समाज को विकसित और सभ्य तभी कहा जा सकता है जब समाज के प्रत्येक वर्ग की राजनीति में भागीदारी हो, सत्ता में हिस्सेदारी हो और जहाँ सभी को आगे बढने के अवसर समान रूप से प्राप्त हों।

संयुक्त राष्ट्र संघ महिलाओं की वास्तविक स्थिति से भिज्ञ है। महिला विकास जब तक नहीं होगा, समाज के विकास का स्वप्न अधूरा रहेगा। यह संयुक्त राष्ट्र संघ भलीभांति जानता हैं इसी उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने 10 दिसम्बर, 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार किया व अपने चार्टर में भी मानव विकास अधिकार को ससम्मान स्थान दिया।

महिलाओं की अवस्था पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अब तक चार विश्व सम्मेलन आयोजित किए गए हैं। चैथा विश्व सम्मेलन 4-15 सितम्बर, 1995 को बीजिंग (चीन) में आयोजित किया गया। महिलाओं पर प्रथम विश्व सम्मेलन मेक्सिको सिटी 1975, द्वितीय विश्व सम्मेलन कोपेनहेगन (डेनमार्क) 1980 तथा तृतीय विश्व महिला सम्मेलन नैरोबी (केन्या) 1985 में आयोजित किया गया था । सम्मेलन में महिलाओं की उन्नति के लिए सभी स्तरों पर महिलाओं को अधिकार देने तथा उनके मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने तथा महिलाओं के लिए ‘समानता , विकास एव शांति’ पर जोर दिया गया।

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